Monday, September 1, 2008

आज़ादी

दरिया में बहा दो रंजिस सब..
अब अमन की कुछ बात हो जाए..
मेरे देश में खुशाली हो...
बस इत्मिनान से मुलाक़ात हो जाए

एक अनोखी ख्वाहिस सी...
सज़ी ज़मीन है फुर्सत से...
अब
माटी के पहलु से-
एक नई फसल-सौगात हो जाए...

जब
सारे अरमां देख लिए...
क्यूँ अपने प्यारे खफ़ा हुए....
आज मिली आज़ादी मे....
फ़िर ईद -मिलन दस्तूर हो जाए....

मैं सब्र में आज डूबा हूँ ...
कुछ दूर चलके रोया हूँ...
वजूद को अपने दूढ़ूँ हरदम...
मैं फ़िर कहीं जाके खोया हूँ...

रेत के घरोंदो को छोड़ो....
अब टूटे सपनों को खोजो...
मेरे साथ चलो नई आवाज़ लिए...
आज फ़िर एक ख्वाब एक उम्मीद हो जाए....

1 comment:

bhumika deep bhandari said...

hi pradeep.... ur creation is really touching & mindblowing....keep on..tc!